logo background
अर्हम् योग
अर्हम् योग
  • Slide 1
  • Slide 2
  • Slide 3
  • Slide 4
  • Slide 5
Right faith, Right Knowledge, Right conduct
These are three jewels of soul. So it is called “Ratnatray”

विश्व का महाशक्तिमान् शांति प्रदायक सारभूत मन्त्र " णमोकार महामंत्र " है

णमो अरिहंताणं
णमो सिद्धाणं
णमो आइरियाणं
णमो उवज्झायाणं
णमो लोए सव्वसाहूणं

इसको अपराजित मन्त्र, अनादि अनिधन मूल मन्त्र, महा मृत्युंजय मन्त्र आदि कई नामो से जाना जाता हैl इस मन्त्र को नमस्कार मन्त्र भी कहा जाता हैl इस मन्त्र में किसी व्यक्ति विशेष को नमस्कार नहीं किया गया है किन्तु उन सभी आत्माओं को नमस्कार किया जाता है जो आत्मायें राग, द्वेष, मोह, कषाय आदि विकारी भावो को जीत चुके हैं । उन्हीं आत्माओं को " जिन " कहा जाता हैl " जिन " आत्माओं में आस्था रखने वाले जैन कहलाते हैl
णमोकार महामंत्र में 5 पद हैं जिनमे पंच परमेष्ठियो को नमस्कार किया जाता हैl परमेष्ठी अर्थांत् परम उत्कृष्ट पद में स्थित आत्मा । यह पांच हैं - अरिहंत, सिद्ध, आचार्य, उपाध्याय एवं साधु l
अरिहंत परमेष्ठी :-
जो कषायों के पूर्ण नाश के द्वारा सर्वज्ञ एवं सर्वदर्शी हुए हैं, वे अरिहंत आत्मा हैं, वह शरीर सहित होते हैl 8 कर्मो में से इनके 4 कर्मो का अभाव हो जाता हैl
सिद्ध परमेष्ठी :-
जो 8 कर्मो से रहित हैं, शरीर से रहित हैं, मात्र ज्ञान स्वरूप, अदृश्य, सूक्ष्म-परिणमन को लिए हुए हैं और लोक के सर्वोच्च स्थान पर सदैव अपने आनंद में मगन रहते हैं । यह पुनः संसार में नहीं आते हैं । अरिहंत एवं सिद्ध परम् शुद्ध आत्मायें हैं जो परमात्मा के रूप में सभी के लिए ध्येय (ध्यान करने योग्य) हैं क्योंकि शुद्ध आत्माओं के ध्यान से ही शुद्ध बना जा सकता हैl
आचार्य परमेष्ठी :-
जो पूर्ण रूप से ग्रह त्याग करके जीवन पर्यन्त के लिए पांच पापो से विरक्त रहते हैं, शिष्यों को शिक्षा, दीक्षा एवं प्रायश्चित देते हैं, व्यवहार कुशल एवं जिन दर्शन के मर्म को जानने वाले होते हैं, स्वकल्याण के साथ समाज, देश और राष्ट्र की उन्नति के बारे में भी प्रयत्नशील रहते हैं, संघ संचालक होते हैं एवं रत्नत्रय की आराधना स्वयं भी करते हैं एवं दूसरों को भी कराते हैं वे आचार्य परमेष्ठी हैं ।
उपाध्याय परमेष्ठी :-
जो पांच पापों से जीवन पर्यन्त के लिए विरक्त रहते हैं, रत्नत्रय के आराधक होते हैं, मुनि संघ को अध्ययन कराने का विशिष्ट कार्य करने से उन्हें उपाध्याय करते हैं ।
साधु परमेष्ठी :-
जो सभी प्रकार के व्यापार, परिगृह से मुक्त होकर जीवनपर्यन्त के लिये 28 मुलगुणो का पालन करते हैं तथा आत्म साधना में तत्पर रहते हैं, ज्ञान-ध्यान में लीन वह साधु परमेष्ठी हैं । कषायों एवं काम वासना से रहित, आत्मिक शुद्धि से पूर्ण, रत्नत्रय धारण करने वाले आचार्य, उपाध्याय एवं साधु परमेष्ठी भी ध्येय (ध्यान करने योग्य) हैं ।

रत्नत्रय -

सम्यक् दर्शन, सम्यक् ज्ञान, सम्यक् चरित्र - इन आत्मिक गुणों को रत्नत्रय कहते हैं ।
सम्यक् दर्शन- अंधविश्वासों से परे एक समीचीन आस्था
सम्यक् ज्ञान- उस समीचीन आस्था के अनुरूप ज्ञान
सम्यक् चरित्र- उस ज्ञान के अनुरूप ढली हुई क्रियाएँ

नोट :- आचार्य एवं उपाध्याय यह विशिष्ट पदवियाँ है जो उनकी कुशलता को देख कर प्रदान की जाती हैं यह दोनों ही साधु के योग्य सभी मूल गुणों का पालन करते हैं ।
णमोकार मन्त्र में सभी पापों को, दुर्विचारों को, विकारी भावों को एवं दुष्कर्मों को नष्ट करने की अद् भुत शक्ति हैl

वर्तमान में जो हिंसा, आतंकवाद, चोरी, दुराचार, भ्रष्टाचार की भावनाओं से जो ब्रह्माण्ड में नकारात्मक ऊर्जा प्रदूषण के रूप में फैलती है, इसी के परिणाम स्वरूप भूकम्प, बाढ़, सुनामी लहरें, दुर्भिक्ष ( समय पर वर्षा एवं अनाज उत्पन्न नहीं होना ) एवं अकाल की स्थिति बनती हैl वैज्ञानिको ने इन Waves को आइनस्टाइन पेन व्हेन (E.P.W.) के रूप में स्वीकार किया हैl 27-11-1997 में जिनिव्हा, स्विट्जरलैंड में विश्व धर्म परिषद हुई थीl उस परिषद में विश्व शान्ति निर्माण करने वाले महामंत्र के रूप में णमोकार मन्त्र को मान्यता दी गईl इसलिए इस णमोकार मन्त्र को पूरे विश्व में शांति के लिए और इस ब्रह्माण्ड को सकारात्मक ऊर्जा से भरने के लिए णमोकार मन्त्र की ध्वनि से उत्पन्न तरंगो की आज बहुत आवश्यकता हैl
णमोकार मन्त्र में उच्चरित ध्वनियों से धनात्मक एवं ऋणात्मक दोनों प्रकार की विद्युत शक्तिया उत्पन्न होती है, जिससे कर्म कालिमा नष्ट हो जाती है, इसी कारण सभी तीर्थंकर भी इस महामंत्र का उच्चारण करते थेl
मन्त्र की ध्वनियों के संघर्ष से आत्मिक शक्तियाँ प्रकट होती है, मन्त्र का निर्माण अनेक बीजाक्षरों से होता हैl ऊँ, ह्रां , ह्रीं, क्लीं आदि ये सभी बीजाक्षर कहलाते हैं । इन सभी में प्रधान " ऊँ " बीजाक्षर है, इसी तरह " अर्हं " है जो बीजाक्षरों से मिलकर बना हुआ मन्त्र हैl
" अर्हं " में प्रथम अक्षर " अ " अंतिम अक्षर " ह " है जो अ से ह तक की पूरी वर्णमाला के अक्षरो की शक्तियों को समेटे हुए हैl अर्थांत् ज्ञान से पूर्ण भरा हुआ मन्त्रl
आचार्य " शुभचन्द्र " ध्यान के महाग्रंथ " ज्ञानार्णव " में लिखते है कि- बुद्धिमान योगी को ज्ञान के लिए बीजभूत संसार में वंदनीय जन्म, मरण रूप अग्नि को शांत करने के लिए मेघ सामान पवित्र एवं महान ऐश्वर्यशाली इस मन्त्र का ध्यान करना चाहिएl यह सभी प्रकार की अभीष्ट सिद्धियों को देने वाला हैl
यह अर्हं - अ से अरहंत और नमो लोए सव्वसाहूणं में साहू शब्द के ह कार को ग्रहण करके बना हैl इसलिए यह ऊँ कार की तरह पांच परमेष्ठी का वाचक हैl इसे सिद्ध परमेष्ठी का वाचक भी कहा है ।
अर्हं योग-योग का अर्थ जुड़ना होता हैl अर्हं मन्त्र के माध्यम से या णमोकार मन्त्र के माध्यम से अपने शरीर, मन एवं वचन को शुद्ध एवं ज्ञान से परिपूर्ण आत्माओं से जोड़ना " अर्हम् योग " कहलाता हैl जिसके फल स्वरूप अपने ही आत्म तत्व से जुड़ना होता हैl इसलिए यह आत्म योग / परमात्म योग भी हैl

अर्हम् योग = परमात्म योग = आत्म योग

सावधानी - अर्हम् योग करने से पहले पांच नमस्कार मुद्रा, स्थिर आसन और श्वासोच्छवास के द्वारा णमोकार मन्त्र को 9 बार पढ़ना जरुरी हैl इस प्रक्रिया को करने से शारीरिक रोग और मानसिक दुर्बलताओं को जीतने की अदम्य शक्ति प्राप्त होती हैl अर्हं योग सभी प्रकार की सांसारिक कामनाओ की पूर्ति तो करता ही है, साथ ही चित्त की स्थिरता करके आत्मिक सुख का आनंद भी प्रदान करता हैl
Copyright © 2015 Arham Yoga | Developed By: Kaivalya Techno Soft Pvt. Ltd.