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अर्हम् योग
अर्हम् योग
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मुनि श्री 108 प्रणम्यसागर जी महाराज कहते है कि :-

णमोकार मन्त्र का संक्षिप्त रूप अर्हम है, और अर्हम् का विस्तार णमोकार मन्त्र है । पवित्र आत्माओ की विशिष्ट शक्तियाँ इस णमोकार मन्त्र के अंदर समाहित हैं । जैसे घर्षण से आग उत्पन्न होती है , ऐसे ही मन्त्र के ध्यान से एक आग उत्पन्न होती है, जिसमें हमारे सारे विकार, अहंकार, दुराचार, आक्रामक, भावनाएँ, अराजक उद्देश्य, अश्लील मनोवृत्तियां (मानसिकताएँ) , अशुभ विचार आदि सभी निष्क्रिय हो जाते हैं । स्वभाविक शक्तियाँ प्रकट होने लग जाती हैं । यही से मनुष्य का विकास प्रारम्भ होता हैl मनुष्य का यह विकास उसे देवत्व की और ले जाता है और आगे चलकर वही परम् ब्रह्म ईश्वर की प्राप्ति कर लेता है एवं ईश्वर को अपने अंदर प्रकट कर लेता हैl

ध्यान चक्र



पंच नमस्कार मुद्रा :-

अरिहंत मुद्रा

लाभ - 1) आलस्य दूर होता है । 2) कमर एवं रीढ़ की हड्डी सम्बन्धी रोग दूर होते है । 3) कद बढ़ता है । 4) नई ऊर्जा का संचार होता है । 5) मोटापे में कमी ।

सिद्ध मुद्रा

लाभ - 1) ब्लड प्रेशर नियंत्रित रहता है । 2) हृदय सम्बन्धी रोगों में आराम । 3) श्वास सम्बन्धी बीमारी ठीक होती है । 4) लगातार अभ्यास से अपनी ऊर्जा को नाप सकते हैं ।

आचार्य मुद्रा

लाभ - 1) एकाग्रता बढ़ती है । 2) स्मरण शक्ति बढ़ती है । 3) मानसिक तनाव में कमी आती है । 4) कंधे मजबूत होते हैं ।

उपाध्याय मुद्रा

लाभ - 1) सरवाइकल (गर्दन) दर्द में आराम । 2) फ्रोजन सोल्डर (कंधे के दर्द) में आराम । 3) कलाई के दर्द में आराम । 4) ज्ञान का ग्रहण ।

साधु मुद्रा

लाभ - 1) विनम्रता का विकास । 2) सकारात्मक सोच की वृद्धि । 3) पेट - पीठ सम्बन्धी रोग में आराम । 4) अनिद्रा में लाभ । 5) डायबिटीज़ आदि रोगों में लाभ ।

" महाबीज में वृक्ष छुपा है जागेगा अंतर्बल से
नर में नारायण बैठा है, प्रकटेगा चिंतन से "


Message :-

१- ध्यान रूपी अग्नि में छः आवश्यक कर्मो की क्रियाओ से जो निरंतर व्रत रूपी मंत्रो के द्वारा कर्मो का होम करते रहते है, ऐसे आत्म यज्ञ में लीन साधु की में वंदना करता हूँ ।
आचार्य श्री कुन्दकुन्द देवजी

२- जो ध्याता गुरु के उपदेश से निरंतर ध्यान का अभ्यास करता है वह धीरे-धीरे आत्मशान्ति में ठहर जाता हैl
आचार्य श्री शुभचन्द्र जी

३- ध्यान काल में " ज्ञान का श्रम कहाँ " पूरा विश्राम
आचार्य श्री विद्यासागर जी

४- ध्यान एक पोर्टेबल यान हैl आप जिसकी ऊर्जा के साथ हम कही भी विचरण कर सकते हैl
मुनि श्री प्रणम्यसागर जी
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