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अर्हम् योग
अर्हम् योग
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इतिहास :-


श्रमण संस्कृति इस युग में भगवान आदिनाथ के द्वारा प्रथम तीर्थकर के रूप में सर्वप्रथम प्रवाहित हुईl भगवान आदिनाथ चतुर्थकाल में हुएl जैन दर्शन के अनुसार यह कल 1 कोड़ा-कोडी सागर (असंख्यात वर्षो) का होता हैl भगवान आदिनाथ की ध्यान की मुद्राएँ पदमासन और कार्योत्सर्ग (खड्गासन) के साथ आज भी विश्व की प्राचीन सभ्यताओ जैसे हड़प्पा एवं मोहन जोदड़ो में प्राप्त मोहरो पर अंकित हुई मिली हैl

श्रमण संस्कृति में दिगम्बर मुनि ज्ञान और ध्यान में ही पूरा जीवन व्यतीत करते हैl ध्यान से ही कर्मों का क्षय होता हैl आत्मिक गुणों की उपलब्धि होती हैl
जैन दर्शन में चार प्रकार के ध्यानो का वर्णन भगवान ऋषभदेव ने सर्वप्रथम कियाl उसके बाद आने वाले 23 तीर्थकरों ने भी ध्यान से कर्मो का क्षय होता है यह उपदेश दियाl वर्तमान में चौबीसवें तीर्थकर भगवान महावीर स्वामी का तीर्थ चल रहा है, जिसमे अनेक श्रमण (मुनि, साधु, दिगंबर ऋषि) संतो ने इस ध्यान का प्रयोग करके आत्मीय शुद्धि प्राप्त कीl

णमोकार महामंत्र ध्यान का आलम्बन रहा है, इसी णमोकार मन्त्र से अनेक बीजाक्षरों की उत्पत्ति हुई हैl ऊँ, अर्हम् आदि बीजाक्षर इसी णमोकार मन्त्र से निकले हैंl जिनके ध्यान करने की विधि और उसके फल ध्यान के महान ग्रन्थ ज्ञानार्णव में विस्तृत रूप से दी गई हैl ऊँ को प्रणव मन्त्र माना जाता है और अर्हम् को मंत्रराज स्वीकार किया गया हैl इस मन्त्र के बारे में ज्ञानार्णव में लिखा हैl

अकारादि हकारांतं रेफमध्यं सबिन्दुकम् l
तदेव परमं तत्वं यो जानाति स तत्ववित् ll
ज्ञानार्णव 35/22-1


अर्थ - जिसके आदि में अकार है, अंत में हकार है और मध्य बिंदु रेफ सहित है। वही (अर्ह) उत्कृष्ट तत्व है उसको जो जानता है वह तत्वज्ञ बन जाता हैl
इस अर्हम् के ध्यान से योगी अनेक ऋद्धियों और सिद्धियों को प्राप्त करता हैl अनेक दैत्य, राक्षस, भूत प्रेत स्वयं वश में हो जाते हैं । यह अर्हम् का ध्यान अतीन्द्रिय, अविनश्वर आत्म सुख प्राप्त कराता हैl केवल ज्ञान (सम्पूर्ण ज्ञान, सर्वज्ञ) की प्राप्ति इसी से होती हैl इस तरह अर्हम् का इतिहास इतना ही प्राचीन है जितना मानव जातो का इतिहासl
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